मेरा नाम सूरज है। आज भी जब मैं अपने प्राथमिक विद्यालय के दिनों को याद करता हूँ, तो चेहरे पर अपने आप मुस्कान आ जाती है। वह समय मेरी ज़िंदगी का सबसे सुंदर, सबसे बेफिक्र और सबसे यादगार दौर था। उस समय न किसी बात की चिंता थी, न भविष्य का डर। बस हर दिन खेलना, पढ़ना, दोस्तों के साथ हँसना और नई-नई बातें सीखना ही हमारी दुनिया थी।
मेरे गाँव का प्राथमिक विद्यालय बहुत बड़ा नहीं था, लेकिन हमारे लिए वही पूरी दुनिया था। स्कूल की इमारत साधारण थी। कुछ कमरे पक्के थे और कुछ जगहों पर पेड़ों की छाया में भी पढ़ाई होती थी। स्कूल के सामने एक बड़ा मैदान था, जहाँ सुबह की प्रार्थना होती थी और दोपहर में हम सभी बच्चे खेलते थे।
हर सुबह मैं जल्दी उठता था। माँ मुझे प्यार से जगाती थीं और कहती थीं, “जल्दी उठो बेटा, स्कूल का समय हो गया है।” मैं जल्दी-जल्दी तैयार होकर अपना बस्ता उठाता और दोस्तों के साथ पैदल स्कूल चला जाता। रास्ते में हम खूब बातें करते, कभी दौड़ लगाते और कभी खेतों में उड़ती तितलियों को देखते हुए चलते थे।
स्कूल पहुँचते ही सबसे पहले प्रार्थना होती थी। हम सभी बच्चे लाइन में खड़े होकर राष्ट्रगान और प्रार्थना गाते थे। उसके बाद प्रधानाध्यापक जी हमें अच्छी बातें बताते थे। वे हमेशा कहते थे कि ईमानदारी, मेहनत और अनुशासन ही जीवन में सफलता की सबसे बड़ी कुंजी है। उस समय शायद हमें इन बातों का पूरा अर्थ समझ में नहीं आता था, लेकिन आज महसूस होता है कि उनकी हर बात कितनी सही थी।
हमारे शिक्षक बहुत सख्त भी थे और बहुत स्नेही भी। जब हम पढ़ाई में ध्यान नहीं देते थे, तो डाँट पड़ती थी, लेकिन वही शिक्षक हमारी छोटी-छोटी सफलताओं पर सबसे ज़्यादा खुश भी होते थे। उन्होंने हमें केवल किताबों का ज्ञान ही नहीं दिया, बल्कि अच्छे संस्कार, दूसरों का सम्मान करना और सच्चाई के रास्ते पर चलना भी सिखाया।
मुझे हिंदी और चित्रकला की कक्षा सबसे अधिक पसंद थी। हिंदी की कहानियाँ सुनकर ऐसा लगता था जैसे मैं उन्हीं पात्रों के साथ जी रहा हूँ। चित्रकला की कक्षा में हम रंग-बिरंगे चित्र बनाते थे। कभी पहाड़, कभी नदी, कभी तिरंगा और कभी अपना घर। जब शिक्षक मेरी बनाई हुई ड्राइंग की तारीफ़ करते थे, तो मुझे बहुत खुशी होती थी।
दोपहर की छुट्टी हमारे दिन का सबसे मजेदार समय होता था। हम सभी अपने-अपने टिफिन खोलकर एक-दूसरे के साथ खाना बाँटकर खाते थे। किसी के पास पराठा होता था, किसी के पास पूरी-सब्ज़ी, तो किसी के पास गुड़ और रोटी। हम बिना किसी भेदभाव के सबका खाना मिल-बाँटकर खाते थे। वही सच्ची दोस्ती थी।
हमारे स्कूल में मध्याह्न भोजन भी मिलता था। जब खिचड़ी, दाल-चावल या सब्ज़ी बनती थी, तो उसकी खुशबू पूरे स्कूल में फैल जाती थी। हम सभी बच्चे लाइन लगाकर अपना भोजन लेते थे। उस समय शायद हमें इसकी अहमियत समझ नहीं थी, लेकिन आज महसूस होता है कि वह भोजन केवल खाना नहीं था, बल्कि सरकार की एक ऐसी योजना थी जिसने लाखों बच्चों को स्कूल से जोड़े रखा।
खेलकूद भी हमारे स्कूल जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था। छुट्टी के समय हम कबड्डी, खो-खो, गिल्ली-डंडा, लंगड़ी और क्रिकेट खेलते थे। कभी-कभी खेलते-खेलते कपड़े गंदे हो जाते थे और घर पहुँचने पर माँ की डाँट भी सुननी पड़ती थी। लेकिन अगले दिन फिर वही उत्साह और वही शरारत शुरू हो जाती थी।
मुझे आज भी अपने सबसे अच्छे दोस्तों की याद आती है। हम साथ बैठते थे, साथ पढ़ते थे और साथ खेलते थे। अगर किसी दोस्त की पेंसिल खो जाती थी, तो दूसरा तुरंत अपनी पेंसिल दे देता था। उस समय दोस्ती में कोई स्वार्थ नहीं था। बस एक-दूसरे की मदद करना ही सबसे बड़ी खुशी थी।
स्कूल में हर राष्ट्रीय पर्व बड़े उत्साह से मनाया जाता था। स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर पूरा विद्यालय तिरंगे के रंगों से सज जाता था। हम सभी बच्चे सफेद यूनिफॉर्म पहनकर सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेते थे। देशभक्ति के गीत गाते थे और भाषण भी देते थे। जब हमें मंच पर पुरस्कार मिलता था, तो ऐसा लगता था जैसे हमने दुनिया जीत ली हो।
वार्षिक परीक्षा का समय आते ही पूरे स्कूल का माहौल बदल जाता था। सभी बच्चे मन लगाकर पढ़ाई करते थे। परीक्षा समाप्त होने के बाद गर्मी की छुट्टियों का इंतजार रहता था। परिणाम वाले दिन दिल की धड़कन तेज हो जाती थी। जब अच्छे अंक आते थे, तो घर में मिठाई बाँटी जाती थी और माता-पिता की आँखों में गर्व दिखाई देता था।
आज समय बहुत बदल गया है। अब स्कूलों में स्मार्ट क्लास, कंप्यूटर और डिजिटल शिक्षा का दौर है। बच्चों के पास मोबाइल और इंटरनेट की सुविधा है। लेकिन हमारे समय की सादगी, दोस्ती, मासूमियत और छोटी-छोटी खुशियाँ शायद आज बहुत कम देखने को मिलती हैं। उस समय हमारे पास महंगे खिलौने नहीं थे, लेकिन खुशियाँ बहुत थीं। हमारे पास बड़े-बड़े साधन नहीं थे, लेकिन संतोष और अपनापन भरपूर था।
आज जब मैं अपने जीवन में आगे बढ़ने की कोशिश कर रहा हूँ, तब मुझे अपने प्राथमिक विद्यालय के दिन बार-बार याद आते हैं। वहीं से मैंने अनुशासन सीखा, मेहनत करना सीखा, हार न मानना सीखा और अच्छे इंसान बनने की सीख मिली। मेरे शिक्षक, मेरे दोस्त और मेरा वह छोटा-सा विद्यालय हमेशा मेरी यादों में बसे रहेंगे।
सच कहा जाए तो प्राथमिक विद्यालय केवल पढ़ाई की जगह नहीं था, बल्कि वह हमारी ज़िंदगी की पहली पाठशाला थी, जहाँ हमने किताबों से पहले इंसानियत, दोस्ती, सम्मान और मेहनत का महत्व सीखा। आज भी जब उन दिनों को याद करता हूँ, तो दिल यही कहता है कि अगर जीवन में एक बार फिर बचपन लौट आए, तो मैं उसी प्राथमिक विद्यालय की घंटी, उसी मैदान और उन्हीं दोस्तों के साथ फिर से वही सुनहरे पल जीना चाहूँगा।

