मैट्रिक की परीक्षा पास करने के बाद मेरे जीवन में एक नया अध्याय शुरू हुआ, जिसका नाम था इंटरमीडिएट। यह समय केवल पढ़ाई का नहीं था, बल्कि खुद को समझने, नए सपने देखने और भविष्य की दिशा तय करने का भी था। इंटरमीडिएट के दो साल मेरी ज़िंदगी के सबसे महत्वपूर्ण वर्षों में से एक रहे। इन्हीं वर्षों में मैंने जिम्मेदारियों को समझा, मेहनत का असली महत्व जाना और अपने करियर के बारे में गंभीरता से सोचना शुरू किया।
कॉलेज का पहला दिन आज भी मेरी यादों में ताज़ा है। नया परिसर, नए शिक्षक और नए दोस्त—सब कुछ नया-नया लग रहा था। स्कूल की तुलना में कॉलेज का माहौल बिल्कुल अलग था। यहाँ कोई बार-बार पढ़ने के लिए नहीं कहता था। अपनी पढ़ाई की जिम्मेदारी अब खुद उठानी थी। शुरुआत में थोड़ा अजीब लगा, लेकिन धीरे-धीरे मैं उस माहौल में ढल गया।
इंटरमीडिएट के दौरान पढ़ाई का स्तर पहले से कहीं अधिक कठिन था। हर विषय में गहराई से पढ़ना पड़ता था। किताबें मोटी थीं और पाठ्यक्रम भी बड़ा था। कई बार ऐसा लगता था कि इतना सब कुछ कैसे याद होगा, लेकिन मैंने हार नहीं मानी। मैंने रोज़ का टाइम-टेबल बनाया और उसी के अनुसार पढ़ाई शुरू कर दी। सुबह जल्दी उठकर पढ़ना, कॉलेज जाना, वापस आकर नोट्स बनाना और रात में दोबारा रिवीजन करना मेरी रोज़मर्रा की आदत बन गई।
कॉलेज में कुछ ऐसे शिक्षक मिले जिन्होंने सिर्फ किताबों का ज्ञान ही नहीं दिया, बल्कि जीवन जीने का तरीका भी सिखाया। वे हमेशा कहते थे कि “सफलता केवल अंक लाने से नहीं मिलती, बल्कि अच्छे इंसान बनने से मिलती है।” उनकी बातें मेरे दिल को छू जाती थीं और पढ़ाई के प्रति मेरा उत्साह और बढ़ जाता था।
इंटरमीडिएट के दिनों में मेरे कई अच्छे दोस्त बने। हम सभी अलग-अलग गाँव और कस्बों से आए थे, लेकिन हमारा लक्ष्य एक ही था—अच्छे अंकों से परीक्षा पास करना और अपने परिवार का नाम रोशन करना। हम अक्सर लाइब्रेरी में साथ बैठकर पढ़ते थे। कोई गणित समझाता, कोई अंग्रेज़ी और कोई विज्ञान के कठिन अध्याय। जब किसी का मन पढ़ाई में नहीं लगता, तो बाकी दोस्त उसे प्रेरित करते। यही दोस्ती हमारे लिए सबसे बड़ी ताकत बन गई।
कॉलेज में कई सांस्कृतिक कार्यक्रम और खेल प्रतियोगिताएँ भी होती थीं। पढ़ाई के साथ-साथ इन गतिविधियों में भाग लेने का मौका मिलता था। मंच पर भाषण सुनना, सांस्कृतिक कार्यक्रम देखना और दोस्तों के साथ हँसी-मज़ाक करना आज भी याद आता है। इन पलों ने पढ़ाई के तनाव को कम किया और कॉलेज जीवन को और भी यादगार बना दिया।
घर पर भी सभी की उम्मीदें मुझसे जुड़ी हुई थीं। मेरे माता-पिता चाहते थे कि मैं मन लगाकर पढ़ाई करूँ और भविष्य में एक अच्छा मुकाम हासिल करूँ। आर्थिक परिस्थितियाँ बहुत मजबूत नहीं थीं, इसलिए मैं जानता था कि मेरी मेहनत ही परिवार के सपनों को पूरा कर सकती है। यही सोच मुझे हर दिन और अधिक मेहनत करने की प्रेरणा देती थी।
जैसे-जैसे बोर्ड परीक्षा नज़दीक आने लगी, वैसे-वैसे पढ़ाई का दबाव भी बढ़ने लगा। कॉलेज में लगातार टेस्ट लिए जा रहे थे। शिक्षक बार-बार महत्वपूर्ण प्रश्नों का अभ्यास करवाते थे। मैंने पिछले वर्षों के प्रश्नपत्र हल करना शुरू किया। इससे परीक्षा का पैटर्न समझ में आया और आत्मविश्वास भी बढ़ा।
परीक्षा से एक रात पहले मुझे बिल्कुल नींद नहीं आ रही थी। मन में तरह-तरह के विचार चल रहे थे। कहीं कोई प्रश्न छूट न जाए, कहीं समय कम न पड़ जाए—ऐसी कई बातें मन में थीं। लेकिन मैंने खुद को शांत किया और सोचा कि जितनी मेहनत की है, उसका परिणाम जरूर मिलेगा।
परीक्षा वाले दिन सुबह जल्दी उठकर भगवान का आशीर्वाद लिया और परीक्षा केंद्र के लिए निकल पड़ा। परीक्षा केंद्र पर सभी विद्यार्थी अपने-अपने नोट्स आखिरी बार देख रहे थे। घंटी बजते ही हम सभी अपने-अपने कमरों में चले गए। प्रश्नपत्र हाथ में आते ही मैंने सबसे पहले उसे ध्यान से पढ़ा। कुछ प्रश्न आसान थे और कुछ थोड़े कठिन, लेकिन मैंने घबराने के बजाय पूरे आत्मविश्वास के साथ उत्तर लिखना शुरू किया।
हर परीक्षा के बाद दोस्तों के साथ बाहर निकलकर चर्चा होती थी। कोई कहता कि उसका पेपर बहुत अच्छा गया, तो कोई किसी प्रश्न को लेकर परेशान रहता। लेकिन अब जो होना था, वह हो चुका था। धीरे-धीरे सभी विषयों की परीक्षाएँ समाप्त हो गईं और अब परिणाम का इंतज़ार शुरू हो गया।
रिज़ल्ट आने का दिन मेरे जीवन के सबसे यादगार दिनों में से एक था। मैंने इंटरनेट पर अपना रोल नंबर दर्ज किया। कुछ ही क्षणों बाद स्क्रीन पर मेरा परिणाम दिखाई दिया। मैं अच्छे अंकों से इंटरमीडिएट परीक्षा उत्तीर्ण हो चुका था। उस समय जो खुशी मुझे हुई, उसे शब्दों में व्यक्त करना मुश्किल है। सबसे पहले मैंने यह खुशखबरी अपने माता-पिता को सुनाई। उनकी आँखों में गर्व और खुशी देखकर मुझे लगा कि मेरी मेहनत सफल हो गई।
इंटरमीडिएट के दो वर्षों ने मुझे केवल किताबों का ज्ञान नहीं दिया, बल्कि जीवन के कई महत्वपूर्ण सबक भी सिखाए। मैंने समय का सही उपयोग करना सीखा, कठिन परिस्थितियों में धैर्य रखना सीखा और यह समझा कि सफलता पाने के लिए निरंतर प्रयास करना कितना आवश्यक है। इसी दौरान मैंने अपने भविष्य के बारे में गंभीरता से सोचना शुरू किया और आगे की पढ़ाई तथा करियर के लिए नए लक्ष्य निर्धारित किए।
आज जब मैं पीछे मुड़कर उन दिनों को याद करता हूँ, तो कॉलेज का परिसर, दोस्तों के साथ बिताए गए पल, शिक्षकों की सीख, लाइब्रेरी में बिताए घंटे और परीक्षा की तैयारियाँ सब कुछ किसी फिल्म की तरह आँखों के सामने आ जाता है। वे दिन भले ही बीत गए हों, लेकिन उनकी यादें हमेशा मेरे दिल में रहेंगी।
इंटरमीडिएट मेरे जीवन का वह पड़ाव था जिसने मुझे आत्मनिर्भर बनने की दिशा दिखाई। इसने मुझे सिखाया कि अगर इंसान अपने लक्ष्य पर ध्यान रखे, मेहनत करे और कभी हार न माने, तो सफलता निश्चित रूप से उसके कदम चूमती है। यही अनुभव आज भी मुझे हर नए लक्ष्य की ओर आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।
आज भी जब मैं अपने इंटरमीडिएट के दिनों को याद करता हूँ, तो मन गर्व और खुशी से भर जाता है। वे दो साल केवल पढ़ाई के नहीं थे, बल्कि सपनों को पहचानने, संघर्ष को अपनाने और भविष्य की मजबूत नींव रखने के साल थे। यही वजह है कि इंटरमीडिएट की यादें मेरी ज़िंदगी के सबसे अनमोल और प्रेरणादायक अध्यायों में हमेशा शामिल रहेंगी।

