मेरा नाम सूरज है। प्राथमिक विद्यालय की पढ़ाई पूरी करने के बाद मैंने अपने जीवन की नई शुरुआत मिडिल स्कूल में की। यह समय मेरे जीवन का एक ऐसा पड़ाव था, जहाँ बचपन की मासूमियत धीरे-धीरे जिम्मेदारियों में बदलने लगी। मिडिल स्कूल ने मुझे केवल नई किताबें और नए विषय ही नहीं दिए, बल्कि आत्मविश्वास, अनुशासन और बड़े सपने देखने की प्रेरणा भी दी।
जब मैं पहली बार मिडिल स्कूल पहुँचा, तो सब कुछ नया-नया लग रहा था। स्कूल की इमारत पहले वाले स्कूल से कहीं बड़ी थी। यहाँ कई कक्षाएँ थीं, एक बड़ा खेल का मैदान था, पुस्तकालय था और विज्ञान की प्रयोगशाला भी थी। नए शिक्षक, नए दोस्त और नया माहौल देखकर शुरुआत में थोड़ा डर लगा, लेकिन कुछ ही दिनों में मैं सभी के साथ घुल-मिल गया।
हर सुबह मैं समय पर उठता, स्कूल की यूनिफॉर्म पहनता, अपना बैग तैयार करता और साइकिल से या दोस्तों के साथ पैदल स्कूल जाता। रास्ते में हम पढ़ाई की बातें कम और शरारतें ज़्यादा करते थे। कभी आम के पेड़ों के नीचे रुक जाते, कभी खेतों के रास्ते से शॉर्टकट लेते और कभी-कभी देर होने पर तेज़ी से दौड़ते हुए स्कूल पहुँचते।
स्कूल की शुरुआत हमेशा प्रार्थना सभा से होती थी। सभी छात्र मैदान में लाइन लगाकर खड़े होते थे। राष्ट्रगान, प्रार्थना और दिन की महत्वपूर्ण घोषणाएँ होती थीं। प्रधानाध्यापक जी हमें हमेशा मेहनत, ईमानदारी और समय की कीमत समझाते थे। उनकी बातें आज भी मेरे जीवन में प्रेरणा देती हैं।
मिडिल स्कूल में पढ़ाई पहले से कठिन हो गई थी। अब हिंदी, अंग्रेज़ी और गणित के साथ-साथ विज्ञान, सामाजिक विज्ञान और संस्कृत जैसे विषय भी पढ़ाए जाते थे। शुरुआत में गणित और अंग्रेज़ी मुझे थोड़ी कठिन लगती थी, लेकिन शिक्षकों की मदद और नियमित अभ्यास से धीरे-धीरे आत्मविश्वास बढ़ने लगा।
हमारे शिक्षक बहुत अनुभवी थे। वे केवल किताबों तक सीमित नहीं रहते थे, बल्कि जीवन से जुड़ी कहानियाँ सुनाकर हमें समझाते थे कि शिक्षा का असली उद्देश्य केवल परीक्षा पास करना नहीं, बल्कि एक अच्छा इंसान बनना है। जब कोई छात्र गलती करता था, तो उसे समझाया जाता था, और जब कोई अच्छा प्रदर्शन करता था, तो पूरी कक्षा के सामने उसकी प्रशंसा की जाती थी।
मुझे सबसे अधिक विज्ञान की कक्षा पसंद थी। प्रयोगशाला में छोटे-छोटे प्रयोग करना, पौधों और जानवरों के बारे में जानना तथा नई-नई वैज्ञानिक बातें सीखना मुझे बहुत अच्छा लगता था। इतिहास और भूगोल की कक्षाओं में भारत के महान स्वतंत्रता सेनानियों, नदियों, पहाड़ों और विभिन्न राज्यों के बारे में जानकर देश के प्रति गर्व महसूस होता था।
दोपहर की छुट्टी आज भी मेरी सबसे प्यारी यादों में से एक है। हम सभी दोस्त एक साथ बैठकर अपना टिफिन खोलते थे। कोई पराठा लाता था, कोई चावल, कोई अचार और कोई मिठाई। हम सब मिलकर खाते थे और खूब हँसी-मज़ाक करते थे। अगर किसी का टिफिन नहीं होता था, तो बाकी दोस्त अपना खाना उसके साथ बाँट लेते थे। यही सच्ची दोस्ती थी।
पढ़ाई के साथ-साथ खेलकूद भी हमारे जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा था। कबड्डी, खो-खो, क्रिकेट, वॉलीबॉल और दौड़ प्रतियोगिताओं में भाग लेना हमें बहुत पसंद था। खेलों से हमने टीमवर्क, अनुशासन और हार-जीत को स्वीकार करना सीखा। कई बार हारने के बाद भी हम अगले दिन फिर पूरे जोश के साथ मैदान में उतरते थे।
मिडिल स्कूल के दिनों में सांस्कृतिक कार्यक्रमों का भी विशेष महत्व था। स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस, शिक्षक दिवस और बाल दिवस बड़े उत्साह से मनाए जाते थे। मैं कभी भाषण देता था, कभी कविता सुनाता था और कभी नाटक में भाग लेता था। मंच पर खड़े होकर लोगों के सामने बोलने से मेरा आत्मविश्वास बढ़ा।
स्कूल में वार्षिक खेलकूद प्रतियोगिता और सामान्य ज्ञान प्रतियोगिताएँ भी होती थीं। इन कार्यक्रमों में भाग लेने से हमें अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर मिलता था। जब किसी प्रतियोगिता में पुरस्कार मिलता था, तो पूरे परिवार को बहुत खुशी होती थी और मुझे आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलती थी।
जैसे-जैसे समय बीतता गया, पढ़ाई का दबाव भी बढ़ने लगा। परीक्षाओं के समय हम सभी दोस्त मिलकर पढ़ाई करते थे। एक-दूसरे की मदद करते, कठिन प्रश्नों को समझते और अच्छे अंक लाने की पूरी कोशिश करते थे। परीक्षा समाप्त होने के बाद छुट्टियों का इंतज़ार रहता था, और परिणाम वाले दिन दिल की धड़कन तेज़ हो जाती थी।
मिडिल स्कूल ने मुझे जिम्मेदारी का महत्व सिखाया। अब मैं केवल अपने लिए नहीं, बल्कि अपने परिवार के सपनों के लिए भी मेहनत करने लगा था। मैंने समझ लिया था कि अगर जीवन में कुछ बड़ा करना है, तो शिक्षा सबसे मजबूत आधार है।
आज जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो मिडिल स्कूल के वे दिन किसी खूबसूरत फिल्म की तरह याद आते हैं। दोस्तों की हँसी, शिक्षकों का मार्गदर्शन, खेल का मैदान, कक्षा की शरारतें और परीक्षा का तनाव—ये सभी यादें आज भी मेरे दिल में ताज़ा हैं।
मिडिल स्कूल ने मुझे केवल किताबों का ज्ञान नहीं दिया, बल्कि जीवन की दिशा भी दी। यहीं से मैंने बड़े सपने देखना शुरू किया और यह विश्वास पैदा हुआ कि मेहनत और लगन से कोई भी लक्ष्य हासिल किया जा सकता है। आज मैं जहाँ भी हूँ, उसमें मेरे मिडिल स्कूल के शिक्षकों, दोस्तों और उन सुनहरे दिनों का बहुत बड़ा योगदान है।
मेरे लिए मिडिल स्कूल केवल शिक्षा का केंद्र नहीं था, बल्कि वह एक ऐसी जगह थी जहाँ मैंने दोस्ती, अनुशासन, आत्मविश्वास, मेहनत और सपनों को साकार करने की शुरुआत की। यही कारण है कि मेरे जीवन की सबसे अनमोल यादों में मिडिल स्कूल का स्थान हमेशा सबसे खास रहेगा।

